पटना
राजद के राष्ट्रीय महासचिव एवं मीडिया प्रभारी कैलाश यादव ने आज एक प्रेस बयान जारी करते हुए कहा कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा देश के लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक संकेत है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह इस्तीफा स्वेच्छा से नहीं बल्कि दबाव में लिया गया फैसला है।
यादव ने कहा कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली बार है जब किसी उपराष्ट्रपति ने कार्यकाल के बीच में इस्तीफा दिया है। उन्होंने इसे अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि वर्ष 2014 से केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से संवैधानिक संस्थाओं का निरंतर क्षरण हो रहा है। कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका और स्वतंत्र मीडिया सभी दबाव में हैं।

राजद नेता ने दावा किया कि धनखड़ के इस्तीफे से एक दिन पहले राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर चर्चा की मांग की थी। खड़गे के सवाल पर जब उपराष्ट्रपति ने सरकार की प्रतिक्रिया मांगी, तो नेता सदन जेपी नड्डा ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि "इस विषय पर की गई कोई भी बात सदन की कार्यवाही में दर्ज नहीं की जाएगी।"
यादव ने कहा कि यह टिप्पणी न सिर्फ उपराष्ट्रपति के संवैधानिक पद का अपमान है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध भी है। उन्होंने कहा, "संसद की मर्यादा के अनुरूप किसी संवैधानिक पदाधिकारी के निर्देशों की अनदेखी करना और सार्वजनिक रूप से उसकी अनदेखी करना, सरकार की अहंकारी मानसिकता को दर्शाता है।"
उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा नेताओं द्वारा धनखड़ को लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा था। उन्हें बुलाए जाने के बावजूद आवश्यक बैठकों में शामिल नहीं होना, सार्वजनिक रूप से उनके पद की गरिमा की उपेक्षा करना—ये सभी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि धनखड़ पर लगातार दबाव बनाया जा रहा था। अंततः, उन्होंने "स्वास्थ्य कारणों" का हवाला देते हुए ट्विटर (अब X) के माध्यम से अपना इस्तीफा दे दिया।
यादव ने साथ ही सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट द्वारा प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्यप्रणाली पर हाल ही में की गई कड़ी टिप्पणी का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की पत्नी बी.एम. पार्वती के खिलाफ ED की कार्यवाही को सुप्रीम कोर्ट ने "राजनीतिक प्रेरणा से प्रेरित" बताया और चेतावनी दी कि संवेदनशील मामलों में ईडी का राजनीतिक दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
यादव ने अंत में कहा कि आज देश में लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएं गंभीर संकट से गुजर रही हैं। अधिकारी, कर्मचारी, पत्रकार और आम नागरिक, सभी के अधिकारों और स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह प्रवृत्ति नहीं रुकी तो इसका प्रभाव देश की एकता और लोकतंत्र पर गंभीर रूप से पड़ेगा।
